प्रभाष जोशी: जब अख़बार की भाषा में आदमी बोलता था

✍️ मोहित धवन
लखनऊ, 26 सितंबर 2026

आज इंटरनेट पर प्रभाष जोशी का ‘कागद कारे’ तलाशते हुए अचानक वे रविवार याद आ गए, जब जनसत्ता का इंतजार हुआ करता था। जहां मैं रहता था, वहां अख़बार आसानी से नहीं मिलता था। कई बार उसे पाने के लिए ऑटो या रिक्शे में दस रुपये खर्च कर देता था। वजह थी—रविवार को छपने वाला ‘कागद कारे’ पढ़ना है।

आज वह दस रुपये वाली बात छोटी लग सकती है, लेकिन शायद किसी लेखक के प्रति पाठक की बेचैनी का अपना हिसाब होता है।

प्रभाष जोशी को पढ़ने का आकर्षण उनकी बात कहने की शैली में था। वे अपने किसी अनुभव, मुलाकात, क्रिकेट के प्रसंग या रोजमर्रा की छोटी-सी घटना से बात शुरू करते। भाषा ऐसी होती जैसे कोई सामने बैठकर बतिया रहा हो। पढ़ते-पढ़ते वही सामान्य-सा किस्सा कब समाज, राजनीति या अपने समय के किसी गंभीर सवाल तक पहुंच जाता, पता ही नहीं चलता था। एक बार शुरू किया तो पूरा पढ़े बिना छोड़ना मुश्किल होता।

प्रभाष जोशी हिंदी पत्रकारिता के उन संपादकों में रहे जिन्होंने अख़बार की भाषा को अपनी अलग पहचान दी। मध्य प्रदेश में जन्मे जोशी 1983 में शुरू हुए जनसत्ता के संस्थापक संपादक थे। गांधी उनके चिंतन में रहे, क्रिकेट उनके लेखन का प्रिय विषय था और राजनीति तथा समाज पर उनकी अपनी स्पष्ट दृष्टि थी। बोलचाल और देशज शब्दों को संपादकीय गंभीरता के साथ बरतने की उनकी शैली ने हिंदी पत्रकारिता में अलग जगह बनाई। 1992 में शुरू हुआ ‘कागद कारे’ आगे चलकर उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

उस स्तंभ की शुरुआत भी दिलचस्प थी। 5 अप्रैल 1992 को पहले ‘कागद कारे’ में उन्होंने क्रिकेट के ‘कोकाकोलाकरण’ की बात उठाई। क्रिकेट उनके लिए केवल स्कोर, हार और जीत नहीं था। खेल के साथ बढ़ता बाजार भी उनकी निगाह में था। ‘कोकाकोलाकरण’ जैसा एक शब्द उस बदलाव की तरफ इशारा कर रहा था, जो आने वाले वर्षों में कहीं ज्यादा बड़ा दिखाई देने वाला था। आज के क्रिकेट को देखते हुए उस समय उठाई गई बात को फिर पढ़ना अपने आप में दिलचस्प अनुभव है।

शायद प्रभाष जोशी को इतने वर्षों तक पढ़ने का कुछ असर मेरे अपने पत्रकारिता लेखन पर भी रहा। मेरे भीतर यह बात कहीं बैठ गई कि पाठक से रिश्ता बने बिना बात उसके भीतर तक नहीं पहुंचती। इसीलिए किसी बड़ी घटना के बीच खड़ा सामान्य आदमी, बाजार की कोई पुरानी दुकान, रास्ते में हुई बातचीत या किसी व्यक्ति का छोटा-सा अनुभव मुझे अक्सर लिखने की वजह देता है।

यह प्रभाष जोशी जैसा लिख पाने का दावा नहीं है। इतना जरूर है कि उन्हें पढ़ते हुए लेखन को देखने का एक तरीका मिला।

आज ‘कागद कारे’ ऑनलाइन खोजते हुए यह भी लगा कि इन वर्षों में पत्रकारिता की दुनिया कितनी बदल गई है। तब अख़बार के लिए अगली सुबह का इंतजार था; अब खबर घटना के साथ स्क्रीन पर है। पाठक की चिट्ठी की जगह तत्काल प्रतिक्रिया ने ले ली है और अख़बार के पन्नों से निकलकर पत्रकारिता वेबसाइट, यूट्यूब और सोशल मीडिया तक फैल गई है।

इसी बदलाव के बीच एक सवाल मन में आया—

प्रभाष जोशी होते तो आज की पत्रकारिता को कैसे देखते?

शायद उन्हें यह दुनिया दिलचस्प लगती, जहां किसी लेखक को अपनी बात कहने के लिए हमेशा अख़बार के पन्ने की जरूरत नहीं। लेकिन खबर की रफ्तार, वायरल होने की होड़, बदलती भाषा और पाठक के घटते ठहराव को वे किस नजर से देखते—यह जानना और भी दिलचस्प होता।

उनकी ओर से इसका जवाब देना ठीक नहीं होगा।

आज उन्हें याद करते हुए मेरे सामने किसी बड़े संपादक की कुर्सी नहीं, एक पुरानी-सी तस्वीर उभरती है—रविवार का दिन, हाथ में जनसत्ता और उसमें खुला ‘कागद कारे’।

तब उसे तलाशने के लिए घर से निकलना पड़ता था।

आज स्क्रीन पर तलाश रहा हूं।

बीच में तीन दशक से ज्यादा का समय गुजर गया है।

शायद कुछ अच्छे लेख समय के साथ पुराने हो जाते हैं, लेकिन उन्हें पढ़ने की वजह पुरानी नहीं होती।

बप्पा विदा हो गए… लेकिन क्या कुछ हमारे भीतर रह गया?

✍️ मोहित धवन
लखनऊ, 25 सितंबर 2026

गणेश उत्सव के पिछले कुछ दिनों को बहुत करीब से देखने का मौका मिला। अब बप्पा की विदाई के बाद, उन तस्वीरों को पलटते हुए कुछ सवाल मन में ठहर गए हैं।

कहीं विशाल पंडाल सजे थे, कहीं छोटी-सी प्रतिमा के सामने पूरा परिवार बैठा था। कहीं बच्चे बप्पा को चिट्ठियां लिख रहे थे, कहीं मोदक चढ़ रहे थे। शाम होते ही आरती, भजन और ढोल के बीच शहर जैसे कुछ देर के लिए अपनी रोजमर्रा की भागदौड़ भूल जाता था।

कहीं तीन दिन में, कहीं पांच, सात या दस दिनों बाद बप्पा विदा हो गए। पंडाल सिमट गए, ढोल की आवाज़ थम गई और शहर फिर अपनी रोजमर्रा की रफ्तार में लौटने लगा।

“गणपति बप्पा मोरया… अगले बरस तू जल्दी आ…”

इस आवाज़ में उत्साह भी था और विदाई की हल्की-सी उदासी भी।

इन दिनों यह सब देखते हुए मेरे मन में एक सवाल बार-बार आया—हम बप्पा को इतने प्रेम से बुलाते हैं और फिर उनका विसर्जन क्यों करते हैं?

खासकर उत्तर भारत में कुछ लोगों के मन में यह सवाल स्वाभाविक हो सकता है। जिन्हें हम अपना मानते हैं, घर लाते हैं, सुबह-शाम उनके सामने बैठते हैं, फिर कुछ दिनों बाद उनकी विदाई क्यों?

इसकी धार्मिक और पारंपरिक व्याख्याएं अपनी जगह हैं। मुझे लगा, शायद इसका एक अर्थ अपने जीने में भी खोजा जा सकता है।

मिट्टी से एक स्वरूप बनता है। हम उससे जुड़ते हैं, उसे सजाते हैं, उसके सामने अपनी बातें रखते हैं और कुछ दिनों बाद वही स्वरूप फिर प्रकृति में लौट जाता है।

तो क्या स्थायी प्रतिमा नहीं, उससे जुड़ा भाव और उससे मिली समझ है?

यहीं मुझे मध्यस्थ दर्शन में समझी एक बात याद आती है—“श्रेष्ठ आचरण का अनुकरण ही पूजा है।”

मेरे लिए यह छोटी-सी बात पूजा को देखने का एक नया रास्ता खोलती है।

गणेश जी को हम बुद्धि और विवेक से जोड़कर देखते हैं। उन्हें देखते हुए मेरे मन में यह सवाल भी आया कि यह विवेक हमारे अपने जीने में कहां दिखाई देता है?

उन्हें विघ्नहर्ता कहते हुए एक और सवाल उठा—जिन विघ्नों को हम दूर करने की प्रार्थना करते हैं, उनमें से कुछ कहीं हमारे अपने भीतर तो नहीं?

ये किसी निष्कर्ष की तरह नहीं हैं। बस वे सवाल हैं जो इस उत्सव के बीच मेरे भीतर उठे।

मध्यस्थ दर्शन में एक और बात मुझे छूती है—सह-अस्तित्व। यानी हम अकेले नहीं हैं; हमारा होना संबंधों और प्रकृति से जुड़ा है।

इन दिनों पंडालों के आसपास इसका एक छोटा-सा रूप भी दिखाई दिया। कोई प्रतिमा बना रहा था, कोई सजावट में लगा था, कोई प्रसाद बांट रहा था, तो कोई व्यवस्था संभाल रहा था। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं, युवा—अलग-अलग लोग किसी एक भाव के आसपास साथ दिखाई दिए।

शायद उत्सव की खूबसूरती भी यहीं है—कुछ समय के लिए ‘मैं’ थोड़ा पीछे होता है और ‘हम’ सामने दिखाई देने लगता है।

अब विसर्जन हो चुका है। पंडाल हटने लगे हैं, रोशनियां उतर गई हैं और ढोल की आवाज़ भी धीरे-धीरे थम गई है।

लेकिन शायद एक सवाल अभी भी वहीं है—

इन दिनों में जो महसूस किया, उसमें से कितना हमारे साथ आया?

जरूरी नहीं कि इसका कोई बहुत बड़ा उत्तर मिले। लेकिन अगर इन दिनों की कोई छोटी-सी अनुभूति हमारे रिश्तों, हमारे फैसलों या प्रकृति को देखने के ढंग में कहीं ठहर जाए, तो शायद उत्सव हमारे भीतर भी थोड़ा-सा बचा रहता है।

तब विसर्जन केवल विदाई नहीं रह जाता।

बप्पा विदा हो गए हैं। मिट्टी का स्वरूप प्रकृति में लौट गया। लेकिन उससे जुड़ा कोई भाव, कोई सवाल या शायद कोई छोटी-सी समझ हमारे भीतर रह गई हो—तो संभव है उत्सव अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

अगले बरस जब बप्पा फिर आएं, शायद यही देखना दिलचस्प होगा कि इस बार के उत्सव से हमारे भीतर कुछ बचा भी था या नहीं।

मेरे लिए इस बार के गणेश उत्सव का शायद यही सबसे सुंदर प्रसाद है।

पंडित चाट: स्वाद से आगे भी कुछ है यहां…

✍️ मोहित धवन
लखनऊ, 21 सितंबर 2026

पिछले आठ महीनों में अमीनाबाद का यह मेरा दूसरा ही चक्कर था। जाने का मन कई बार हुआ, लेकिन वहां के ट्रैफिक और भीड़ का ख्याल आते ही हिम्मत जवाब दे जाती है।

कल तय हुआ—अमीनाबाद की चाट खानी है।

गाड़ी हनुमान सेतु मंदिर के पास छोड़ी और वहां से ई-रिक्शा पकड़ लिया। कुछ देर बाद अमीनाबाद की जानी-पहचानी हलचल के बीच हम पहुंच गए—पंडित चाट।

दुकान को देखते ही लगा जैसे समय यहां कुछ धीरे चला हो। करीब पच्चीस साल पुरानी मेरी यादों से बहुत कुछ मिलता-जुलता था। हां, जगह बदली हुई लगी। बातचीत में पता चला कि पिछले करीब 24 वर्षों में आसपास ही यह तीसरी जगह है, जहां से दुकान चल रही है।

बात आगे बढ़ी तो इस स्वाद का इतिहास भी खुलने लगा। इसकी जड़ें उस दौर तक जाती हैं, जब चाट दुकान के काउंटर से नहीं, गलियों में घूमकर परोसी जाती थी। बताते हैं कि अंगद महाराज फतेहगंज से गणेशगंज तक घूम-घूमकर चाट बेचा करते थे। वर्ष 1927 में यह कारोबार नगरपालिका में दर्ज हुआ। यानी अगले साल इसके दर्ज इतिहास को सौ वर्ष पूरे हो जाएंगे।

आलू टिक्की, पानी के बताशे, मटर चाट, पालक और मिक्स चाट यहां की पहचान हैं। लेकिन ‘सुरसुरी चाट’ यानी धनिया के आलू का अपना स्वाद है—धनिये की खुशबू के साथ ऐसा तीखापन, जो पहली ही चम्मच में अपनी मौजूदगी दर्ज करा देता है।

पर पंडित चाट की कहानी केवल प्लेट में नहीं है।

काउंटर के बाहर खड़े मिलते हैं सुभाष चंद्र शर्मा। उन्हें देखकर लगता है जैसे वे चाट बेचने से ज्यादा अपने ग्राहकों का स्वागत करने के लिए वहां खड़े हों। कोई पुराना ग्राहक हो या पहली बार आया हो, हर किसी को उसी सहजता से सुनते हैं।

और उनसे दो बातें कर लीजिए तो बातचीत स्वाद से निकलकर जिंदगी तक पहुंच जाती है।

“पच्चीस साल में बहुत कुछ बदल गया। वो जमाना और था, ये जमाना और है।”

सुभाष जी के लिए यह बदलाव सिर्फ बाजार का नहीं है। वे बताते हैं कि पहले कम आमदनी में भी गुजारा हो जाता था। आज कमाई बढ़ी है, लेकिन जरूरतें और मुश्किलें भी बढ़ी हैं। जिंदगी में वह सुकून नहीं रहा। नई पीढ़ी की अपनी सोच और अपने सपने हैं। जरूरी नहीं कि बच्चे उसी काम को चुनें, जिसे परिवार वर्षों से करता आया हो।

इन बातों को कहते हुए उनके स्वर में शिकायत नहीं सुनाई देती। बीते समय की हल्की-सी कसक जरूर है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा आज को स्वीकार करने का ठहराव।

इसी बीच वे एक ऐसी बात कहते हैं, जो शायद बदलते समाज की छोटी-सी तस्वीर भी है—

“पहले घर में सबका स्वाद एक होता था, आज सबका स्वाद अलग है।”

फिर मलिहाबाद से आने वाले अपने एक ग्राहक का किस्सा सुनाते हैं। उन्हें इतनी तीखी चाट चाहिए कि बनाते-बनाते हाथ रुकने लगे—अब और कितनी मिर्च डालें! सुभाष जी मुस्कराते हुए बताते हैं कि फिर भी कोशिश यही रहती है कि इतनी दूर से आया ग्राहक जिस स्वाद की उम्मीद लेकर आया है, उसे वही मिले।

शायद किसी पुराने प्रतिष्ठान की उम्र सिर्फ कैलेंडर के वर्षों से नहीं मापी जाती। उसकी असली उम्र उन लोगों से बनती है, जो बार-बार लौटकर आते हैं और उन हाथों से, जो बदलते वक्त के साथ भी अपनापन बचाए रखते हैं।

अमीनाबाद की गलियों ने इन वर्षों में बहुत कुछ बदलते देखा होगा। दुकान ने भी अपनी जगह बदली, बाजार ने अपना रंग और लोगों ने जीने का ढंग। फिर भी पंडित चाट के बाहर खड़े सुभाष जी को देखकर पुराने लखनऊ की एक खूबी अब भी दिखाई देती है—सामने वाले को ग्राहक से पहले इंसान समझने की।

चाट तो लखनऊ में आप बहुत जगह खा लेंगे। अच्छी चाट भी मिल जाएगी। लेकिन हर जगह से कोई कहानी साथ लेकर नहीं लौटते।

कुछ जगहें स्वाद के कारण याद रहती हैं और कुछ वहां मिले लोगों के कारण।

पंडित चाट में दोनों मिल जाते हैं।

उस शाम धनिया के आलू का तीखापन कुछ देर बाद उतर गया था,
लेकिन सुभाष जी की बातें दिल में रह गईं।

“जब भजन सुनने नहीं, उनमें डूबने लगा Lucknow: Kumar Satyam की Bhajan Jamming”

✍️ Mohit Dhawan
लखनऊ | 18 सितंबर 2026

कल शाम करीब सात बज रहे होंगे। लखनऊ के डॉ. बी.आर. आंबेडकर ऑडिटोरियम में तालियों के बीच कुमार सत्यम की एंट्री होती है। उनके साथ करीब 10–11 कलाकारों की टीम है और सामने बैठे लोगों को शायद तब अंदाजा भी नहीं था कि अगले ढाई घंटे में यह सभागार कभी कृष्ण-भक्ति में झूमेगा, तो कभी राम-भक्ति में डूब जाएगा।

शुरुआत “अच्युतम केशवम्…” से होती है।

पहले ही भजन के बाद कुमार सत्यम सामने बैठे लोगों से कहते हैं—आज वे अकेले नहीं गाएंगे, सभी को उनके साथ स्वर मिलाना होगा। क्योंकि जैमिंग का अर्थ केवल सुनना नहीं, खुद उस संगीत का हिस्सा बन जाना है।

लखनऊ ने उनकी बात मान ली।

“श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवा…” की धुन उठी तो सभागार से भी आवाजें मिलने लगीं। कुमार सत्यम मुस्कराकर बोले—“आपने हमें यहां क्यों बुलाया? आप तो खुद बड़े सुरीले हो!”

कुमार सत्यम के लिए संगीत केवल पेशा नहीं, विरासत भी है। वे ऐसी सांगीतिक परंपरा से आते हैं जिसकी जड़ें कई पीढ़ियों तक जाती हैं। उनकी पारिवारिक संगीत विरासत करीब 13 पीढ़ियों पुरानी बताई जाती है। इसी परंपरा में स्वर्गीय पं. ललन जी महाराज और स्वर्गीय पं. रामाशीष महाराज जैसे नाम भी शामिल रहे हैं। उनके दादा और पिता भी गायकी से जुड़े रहे। भजन, ग़ज़ल, सूफी और सेमी-क्लासिकल गायकी के साथ कुमार सत्यम आज उसी विरासत को अपने अंदाज़ में आगे बढ़ा रहे हैं।

कल शाम उनके इस अंदाज़ की सबसे खूबसूरत बात थी—श्रोताओं से लगातार बनता संवाद।

कभी “तुम श्याम रूप में आना, राधा साथ लेके…” और “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी…” के साथ माहौल कृष्ण-भक्ति में रंग जाता, तो अगले ही पल “श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में…” राम-भक्ति का भाव जगा देता। “पतवार के बिना ही मेरी नाव चल रही है…” जैसे भजन इस यात्रा को एक अलग भाव में ले जाते रहे।

एक प्रस्तुति खत्म होती और लगभग बिना ठहराव अगली धुन शुरू हो जाती। बीच-बीच में गिटार, तबला और दूसरे वाद्ययंत्रों की जुगलबंदी शाम को और जीवंत करती रही। कई बार शब्द थम जाते और वाद्ययंत्र ही जैसे आपस में संवाद करने लगते।

लेकिन असली बदलाव सामने बैठे लोगों में दिखाई दिया।

शुरुआत में लोग अपनी कुर्सियों पर बैठकर तालियां बजा रहे थे। कुछ देर बाद वहीं बैठे-बैठे झूमने लगे। फिर धीरे-धीरे कुर्सियां छूटने लगीं और लोग मंच के सामने पहुंच गए। कोई हाथ उठाकर गा रहा था, कोई तालियां बजा रहा था और कोई कृष्ण-भक्ति के रंग में बेफिक्र होकर नाच रहा था।

अब सामने केवल श्रोता नहीं थे—वे भी प्रस्तुति का हिस्सा बन चुके थे।

शायद यही भजन-जैमिंग की खूबसूरती है। भजन जाना-पहचाना हो सकता है, शब्द पहले भी सुने हो सकते हैं, लेकिन जब सैकड़ों लोग एक साथ उन्हें गाते हैं तो मंच और दर्शक के बीच की दूरी मिटने लगती है।

ढाई घंटे से अधिक समय तक कभी कृष्ण-भक्ति में झूमता, तो कभी राम-भक्ति में डूबता लखनऊ कुमार सत्यम और उनकी टीम के साथ गाता रहा।

कार्यक्रम खत्म होने तक लगा कि लोग यहां भजन सुनने आए जरूर थे, लेकिन लौटते समय उन्हें थोड़ा-सा जीकर जा रहे थे।

कुछ शामें कार्यक्रम खत्म होने के साथ खत्म नहीं होतीं—वे अपने पीछे एक धुन छोड़ जाती हैं।

कल की यह शाम भी शायद उन्हीं में से एक थी।

आज लखनऊ में एक अलग रंग में नजर आएंगे कुमार सत्यम

✍️ मोहित धवन
लखनऊ | 17 सितंबर 2026

आज शाम लखनऊ में भजन सिर्फ सुने नहीं जाएंगे, उन्हें साथ मिलकर गाने और महसूस करने की कोशिश भी होगी। Dr. B.R. Ambedkar Auditorium में जब कुमार सत्यम हारमोनियम के सामने बैठेंगे, तो महफ़िल पारंपरिक भजन संध्या से कुछ अलग होगी। EUM—Emotion, Unity & Music में आज का खास आकर्षण है—Bhajan Jamming।

यानी एक तरफ कलाकार के सुर और दूसरी तरफ श्रोताओं की आवाज़। कोशिश शायद यही होगी कि कुछ देर के लिए मंच और सभागार के बीच की दूरी मिट जाए।

लेकिन कुमार सत्यम हैं कौन?

जो लोग पहली बार उनका नाम सुन रहे हैं, उनके लिए उनका सफर दिलचस्प है। कुमार सत्यम ग़ज़ल, सूफी, भजन और सेमी-क्लासिकल गायकी से जुड़े गायक और हारमोनियम वादक हैं। संगीत उन्हें विरासत में मिला है। वे संगीत परंपरा की 13वीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं और पं. ललन जी महाराज तथा पं. रामाशीष महाराज के संगीत परिवार से आते हैं।

लेकिन विरासत रास्ता दे सकती है, पहचान कलाकार को खुद बनानी पड़ती है।

कुमार सत्यम की गायकी में पुरानी ग़ज़लों की नज़ाकत, सूफियाना संगीत की रूहानियत और भजन की सहजता एक साथ दिखाई देती है। हारमोनियम के सामने वे केवल गाते नहीं; किस्सों, संवाद और अपने सहज अंदाज़ से श्रोताओं को महफ़िल का हिस्सा बनाते चलते हैं। शायद यही जुड़ाव उनकी प्रस्तुतियों को अलग बनाता है।

और आज लखनऊ उन्हें एक दूसरे रंग में सुनने जा रहा है।

भजन हमारे यहां कभी केवल मंचीय प्रस्तुति नहीं रहा। मंदिर की आरती हो, घर का पूजा स्थल या मोहल्ले की भजन संध्या—एक आवाज़ उठती है और दूसरी आवाज़ें उसमें जुड़ती चली जाती हैं। Bhajan Jamming उसी सामूहिक भाव की आधुनिक अभिव्यक्ति बन सकती है।

लखनऊ खुद संगीत, कविता और महफ़िलों का शहर है। ऐसे में आज शाम सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कुमार सत्यम कौन-सा भजन गाते हैं।

सवाल यह भी होगा कि क्या उनके सुर पूरे सभागार को एक स्वर में जोड़ पाते हैं?

शाम अभी बाकी है। महफ़िल अभी सजनी है।

और शायद आज कोई ऐसा सुर भी निकले, जो कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी लखनऊ के साथ कुछ दूर तक चलता रहे।

मोदक: स्वाद से भाव तक की यात्रा

लखनऊ, 16 सितंबर 2026
लेखक ✍️ मोहित धवन

आज तय हुआ कि शाम को बप्पा के दर्शन के लिए जाना है। मन में सहज ही ख्याल आया—उनके प्रिय मोदक तो साथ होने चाहिए। इसी बहाने मिठाई की दुकान पहुंचा। सामने सजे मोदकों पर नजर पड़ी तो कुछ देर ठहर गई। मावा, केसर, मेवे से लेकर चॉकलेट और स्ट्रॉबेरी तक—एक ही मिठाई के इतने रूप। मन में सवाल उठा कि आखिर गणेश जी और मोदक का रिश्ता इतना गहरा क्यों है?

भारतीय परंपरा में भगवान गणेश को ‘मोदकप्रिय’ माना गया है। उनकी अनेक प्रतिमाओं और चित्रों में हाथ में मोदक दिखाई देता है। ‘मोद’ शब्द का संबंध आनंद और प्रसन्नता से माना जाता है। इस अर्थ में मोदक केवल मिठास नहीं, बल्कि तृप्ति और आनंद का प्रतीक भी बन जाता है।

गणेश जी को मोदक प्रिय होने के पीछे कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। उनके विवरण भिन्न हो सकते हैं, लेकिन उनमें ज्ञान, विवेक और संतोष का भाव प्रमुखता से उभरता है। गणेश स्वयं बुद्धि और विवेक के देवता माने गए हैं। शायद इसीलिए उनके हाथ में रखा छोटा-सा मोदक भी अपने भीतर एक बड़ा अर्थ समेटे दिखाई देता है।

महाराष्ट्र में यह परंपरा आज भी घरों की रसोई में जीवित है। गणेश चतुर्थी पर बनने वाले ‘उकडीचे मोदक’ उत्सव का विशेष हिस्सा हैं। चावल के आटे के आवरण में गुड़ और नारियल की भरावन डालकर इन्हें भाप में पकाया जाता है। अनेक परिवारों में इन्हें बनाने की विधि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चली आ रही है। इस प्रक्रिया में केवल एक व्यंजन बनाना नहीं सीखा जाता, परिवार की स्मृतियां और संस्कार भी आगे बढ़ते हैं।

गणेश उत्सव का विस्तार महाराष्ट्र से बाहर हुआ तो मोदक भी देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचा। उत्तर भारत में कभी गणेश पूजा के प्रसाद के रूप में लड्डू अधिक दिखाई देते थे, लेकिन अब यहां भी उत्सव के दिनों में मिठाई की दुकानों पर मोदक की अलग मौजूदगी नजर आती है। लखनऊ में भी पिछले कुछ वर्षों में इसका चलन बढ़ता दिखाई देता है।

समय के साथ इसके स्वाद भी बदले हैं। पारंपरिक गुड़-नारियल और मावा के साथ केसर-पिस्ता, ड्राई फ्रूट, चॉकलेट और फलों के स्वाद ने जगह बनाई है। यह बदलाव बताता है कि परंपराएं हमेशा एक ही रूप में स्थिर नहीं रहतीं। वे नए समय और नई पीढ़ी की पसंद को अपने भीतर जगह देते हुए आगे बढ़ती हैं।

कान्हा भोग स्वीट्स,लखनऊ के मालिक संजीव यादव बताते हैं कि गणेश चतुर्थी और गणेश उत्सव के दौरान मोदक की मांग काफी बढ़ जाती है। उनके यहां अलग-अलग किस्मों के मोदक तैयार किए जाते हैं, लेकिन ग्राहकों के बीच स्ट्रॉबेरी मोदक खासा लोकप्रिय है। कई बार इसकी मांग इतनी अधिक हो जाती है कि यह ‘आउट ऑफ स्टॉक’ तक हो जाता है।

एक पारंपरिक धार्मिक मिठाई में स्ट्रॉबेरी जैसे आधुनिक स्वाद की लोकप्रियता पहली नजर में बाजार का बदलाव लग सकती है, लेकिन इसके भीतर एक दूसरा संकेत भी है। नई पीढ़ी परंपरा को छोड़ नहीं रही, बल्कि कई बार अपने स्वाद और तरीके से उससे जुड़ रही है। रूप नया हो सकता है, पर उससे जुड़ा सांस्कृतिक संदर्भ बना रहता है।

मोदक की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शायद उसका स्वाद भी नहीं है। सवाल यह है कि कोई वस्तु प्रसाद कब बनती है? दुकान के काउंटर पर रखा मोदक एक मिठाई है, लेकिन श्रद्धा के साथ अर्पित होते ही उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। वस्तु वही है, पर उसके साथ जुड़ा भाव उसे नया अर्थ देता है।

यहीं पूजा के अर्थ पर भी विचार किया जा सकता है। यदि पूजा केवल किसी वस्तु को अर्पित करने तक सीमित रह जाए तो उसका दायरा छोटा हो जाता है। जिस श्रेष्ठता को हम पूजते हैं, उसे समझने और अपने आचरण में उतारने की कोशिश भी उससे जुड़े, तो पूजा जीवन से संबंध बनाने लगती है।

शायद इसीलिए हमारी परंपराओं में प्रसाद बांटने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है। जो अर्पित हुआ, वह अकेले अपने लिए नहीं रखा गया। उसे दूसरों के साथ साझा किया गया। यहां मिठास के साथ सहभागिता का भाव भी जुड़ता है।

एक छोटा-सा मोदक इस तरह कई पड़ाव पार करता है। रसोई में वह व्यंजन है, बाजार में मिठाई, पूजा में प्रसाद और बांटने पर संबंधों में मिठास का माध्यम।

“आखिर बप्पा को मोदक इतना प्रिय क्यों है? इसका जवाब सिर्फ स्वाद में नहीं, सदियों पुरानी हमारी परंपरा और मोदक के पीछे छिपे भाव में है…” ❤️🙏

यही शायद मोदक की वास्तविक यात्रा है—स्वाद से प्रसाद तक, प्रसाद से संबंध तक और संबंध से भाव तक।

गणपति बप्पा मोरया: जब बप्पा आते हैं, घर उत्सव बन जाता है

आस्था, परंपरा और सामाजिक जुड़ाव का पर्व, जिसका रंग महाराष्ट्र से निकलकर देश-दुनिया तक पहुंच चुका है

✍️ मोहित धवन
14 सितंबर 2026

गणपति बप्पा मोरया…! 🙏❤️

आज से अगले दस दिनों तक देश के अलग-अलग हिस्सों में यह जयघोष सुनाई देगा। घरों में गणपति विराजेंगे, पंडाल जगमगाएंगे, आरती होगी, मोदक और प्रसाद बंटेंगे। लेकिन गणेशोत्सव की खूबसूरती केवल उसकी भव्यता में नहीं, उस आत्मीयता में भी है, जिसके साथ बप्पा के आने की प्रतीक्षा की जाती है।

महाराष्ट्र में इस भाव को बेहद करीब से महसूस किया जा सकता है। कई दिन पहले से घर सजने लगते हैं, बप्पा के लिए स्थान तैयार होता है और पूरा परिवार स्वागत में जुट जाता है। फिर वह क्षण आता है जब गणपति घर पहुंचते हैं। पूजा की थाली सजती है, चेहरे खिल उठते हैं और वातावरण “गणपति बप्पा मोरया” के जयघोष से भर जाता है।

कोई उन्हें डेढ़ दिन, कोई पांच, सात या दस दिनों तक अपने यहां विराजमान रखता है। सुबह-शाम आरती, मोदक, प्रसाद और मित्रों-रिश्तेदारों का आना-जाना—कुछ ही समय में बप्पा जैसे परिवार का हिस्सा बन जाते हैं।

महाराष्ट्र में गणपति के आगमन से जुड़ी कई लोकमान्यताएं भी सुनने को मिलती हैं। कुछ मान्यताओं में उनके आगमन को ननिहाल आने के पारिवारिक भाव से जोड़ा जाता है। शायद इसीलिए वहां “बप्पा आ रहे हैं” कहना भर अपने आप में उत्सव जैसा लगता है।

भारतीय परंपरा में भगवान गणेश विघ्नहर्ता तथा बुद्धि, विवेक और शुभारंभ के देवता माने गए हैं। हमारे जीवन में उनका स्थान कितना सहज है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि किसी नए कार्य की शुरुआत को हम आज भी ‘श्री गणेश करना’ कहते हैं।

इन दिनों मध्यस्थ दर्शन को समझने की कोशिश में पूजा को देखने की एक और दृष्टि मिली—“श्रेष्ठ आचरण का अनुकरण ही पूजा है।” यह विचार मुझे छूता है। हम जिन गुणों के कारण किसी को श्रेष्ठ मानते हैं, क्या पूजा केवल उनके सामने हाथ जोड़ना है, या उन गुणों को समझकर अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी पूजा है? गणपति को बुद्धि और विवेक का देवता मानते हैं तो उनकी आराधना हमें यह भी देखने का अवसर देती है कि हमारे अपने व्यवहार और निर्णयों में कितना विवेक उतर रहा है।

गणेश पूजा की परंपरा प्राचीन है, लेकिन आधुनिक सार्वजनिक गणेशोत्सव के इतिहास में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का विशेष स्थान है। 1890 के दशक में उन्होंने इसे व्यापक सार्वजनिक स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश शासन के दौर में यह आयोजन आस्था के साथ लोगों के मिलने, संवाद करने और सामाजिक एकजुटता का माध्यम बना। समय के साथ इसका विस्तार महाराष्ट्र की सीमाओं से बहुत आगे हो गया।

इस सामूहिकता को मैंने भारत से हजारों किलोमीटर दूर अफ्रीका में भी महसूस किया।

वहां भारतीय समुदाय गणेशोत्सव बड़े उत्साह से मनाता था। शाम को आरती और उसके बाद भंडारा होता। जिन मित्रों के घर गणपति स्थापित होते, वहां से निमंत्रण आते। एक बार मेरे माता-पिता भी हमारे साथ थे। उम्र में वरिष्ठ होने के कारण शाम की आरती का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी मेरी माताजी को दी गई। परदेस में भारतीय परिवारों के बीच मां को आरती कराते देखना आज भी मेरी स्मृतियों का एक आत्मीय हिस्सा है।

उन दिनों की एक और बात दिल को छूती थी। हमारे मुस्लिम, सिख और ईसाई मित्र भी उतनी ही सहजता से उत्सव में शामिल होते। साथ बैठते, प्रसाद लेते और खुशियां साझा करते। कोई यह नहीं पूछता था कि त्योहार किसका है।

बस लगता था—सब अपने हैं।

कभी-कभी सोचता हूं, जब त्योहार हमें इतनी सहजता से करीब ला सकते हैं तो हम अपने बीच दूरियों की खाइयां क्यों बढ़ने देते हैं? शायद उत्सव का एक अर्थ यह भी है—अपनी आस्था को पूरे मन से जीते हुए दूसरे के लिए भी अपने दरवाजे खुले रखना।

बाद में परिवार के मुंबई में रहने के दौरान गणेशोत्सव का एक अलग रंग देखने को मिला। वहां इन दिनों पूरा शहर जैसे बप्पामय हो जाता है। छोटी सोसायटी से लेकर विशाल सार्वजनिक पंडाल तक हर जगह अपनी सजावट, अपनी आरती और अपने गणपति होते हैं।

उत्सव के अंत में विसर्जन भी आता है। अपने बीच कुछ दिन रहे बप्पा को विदा करने का वह क्षण इस परंपरा का बेहद भावुक पक्ष है—लेकिन उसकी बात फिर कभी करेंगे।

अभी तो बप्पा के आगमन का समय है।

इस बार मेरे लिए गणेशोत्सव का यह अनुभव लखनऊ में होगा। यहां भी कई बड़े पंडाल सज चुके हैं और शहर उत्सव के रंग में उतरने को तैयार है। अगले दस दिनों में इस आस्था, संस्कृति और सामूहिक उल्लास को करीब से महसूस करने की कोशिश रहेगी।

त्योहार शायद इसीलिए जरूरी हैं। वे परंपराओं को जीवित रखते हैं, पीढ़ियों को संस्कृति से जोड़ते हैं और कई बार अलग-अलग पहचान वाले लोगों के बीच भी अपनापन पैदा कर देते हैं।

तो आज विदाई की नहीं, स्वागत की बात हो…
दरवाजे भी खुले हैं और मन भी,
अपने बप्पा जो आ रहे हैं। ❤️🙏

गणपति बप्पा मोरया!

राज खन्ना: किताबों से भरे एक घर की कहानी

पाँच दशक की पत्रकारिता, कानून में मुकाम और शब्दों-रिश्तों से बना एक सफर

✍️ मोहित धवन
12 सितंबर 2026

कुछ लोगों को जानने के लिए उनके पद, पेशे या मिले सम्मानों की सूची पर्याप्त नहीं होती। उन्हें समझना हो तो देखना पड़ता है कि उन्होंने क्या पढ़ा, क्या लिखा, किन रिश्तों को निभाया और जब किसी को उनकी जरूरत पड़ी तो वे कहाँ खड़े थे।

राज खन्ना जी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं।

उनके घर में किताबों के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। अलमारियाँ भर चुकी हैं, दूसरे कोनों तक किताबें पहुँच गई हैं—फिर भी कोई नई और अच्छी किताब सामने आ जाए तो उसे घर लाने का मोह आज भी नहीं छूटता। शायद राज जी को समझने के लिए इससे बेहतर कोई तस्वीर नहीं हो सकती।

करीब पाँच दशक पहले उन्होंने खेल पत्रकारिता से लेखन की शुरुआत की। आगे चलकर इतिहास, राजनीति, स्वतंत्रता आंदोलन, संविधान और समाज उनके प्रमुख विषय बने। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख लगातार प्रकाशित होते रहे।

उनके लेखन की खासियत केवल विषय नहीं, उसे कहने का अंदाज भी है। वे किसी विषय को सिर्फ बताते नहीं, पाठक को अपने साथ लेकर चलते हैं। उनका लेख पढ़ना किसी यात्रा पर निकलने जैसा होता है। कोई पुराना प्रसंग सामने आता है, इतिहास वर्तमान से जुड़ता है और अगली पंक्ति में क्या मिलेगा, यह जिज्ञासा पाठक को अंत तक बाँधे रखती है।

एक दौर में पत्रकारिता और राजनीति से जुड़े कई मित्र चाहते थे कि वे दिल्ली आकर सक्रिय पत्रकारिता करें। अवसर बड़े थे, लेकिन राज जी ने उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में रहना चुना।

नौ भाई-बहनों में सबसे छोटे राज जी के लिए माता-पिता की सेवा और परिवार की जिम्मेदारियाँ करियर से कम महत्वपूर्ण नहीं थीं। बाद में दो बेटियों के पिता बने तो दायित्वों का एक और अध्याय जुड़ा। शायद जिंदगी के कुछ फैसलों का हिसाब इससे नहीं लगाया जाता कि हमने क्या पाया, बल्कि इससे भी कि आगे बढ़ते हुए हमने किसका हाथ नहीं छोड़ा।

राज जी सुल्तानपुर में रहे, लेकिन उनकी कलम वहाँ तक सीमित नहीं रही।

वे दिल्ली नहीं गए, लेकिन उनका लिखा दिल्ली पहुँचता रहा।

इतिहास, राजनीति और सामाजिक विषयों पर उनके लेख लखनऊ से दिल्ली तक पत्रकारिता और राजनीतिक हलकों में पढ़े और चर्चा किए जाते रहे। उनका सफर बताता है कि विचारों को राजधानी पहुँचने के लिए लेखक का राजधानी में रहना जरूरी नहीं।

वर्षों का अध्ययन ‘आजादी से पहले–आजादी के बाद’ और ‘इंडिया अर्थात् भारत’ जैसी पुस्तकों में भी उतरा। इनमें इतिहास केवल तारीखों और घटनाओं में नहीं सिमटता, बल्कि वर्तमान से संवाद करता दिखाई देता है।

पत्रकारिता से इतना लंबा रिश्ता होने के बावजूद राज जी ने इसे अपनी मुख्य आजीविका नहीं बनाया। उनके लिए लेखन कमाई से अधिक रुचि और सामाजिक सरोकार रहा। आजीविका के लिए उन्होंने वकालत को अपना पेशा बनाया।  पेशेवर जीवन में अधिवक्ता के रूप में अपनी समझ, स्पष्टता और निर्भीकता से उन्होंने सम्मानजनक मुकाम बनाया। कानून की फाइलों के बीच भी किताब और कलम से उनका रिश्ता बना रहा।

राज जी को केवल पत्रकार, लेखक या अधिवक्ता के परिचय में बाँधना उन्हें अधूरा जानना होगा। उनके स्वभाव का एक खास हिस्सा है—किसी के काम आना।

वे अक्सर कहते हैं—
“किसी की मदद एक हाथ से करो, तो दूसरे हाथ को भी पता नहीं चलना चाहिए।”

पत्रकारिता, साहित्य और सामाजिक क्षेत्र में उन्हें समय-समय पर अनेक सम्मान मिले। ‘सुलतानपुर रत्न’ जैसे सम्मान भी इनमें शामिल हैं। जब भी किसी सम्मान के साथ पुरस्कार राशि मिली, उन्होंने उसे जरूरतमंदों की सेवा में लगा देना बेहतर समझा। शायद इसीलिए उनके जीवन में किताबों के साथ लोगों की भी एक बड़ी दुनिया है।

मेरे लिए राज जी के व्यक्तित्व का एक पक्ष और भी खास है। लिखने-पढ़ने में मेरी अपनी रुचि के पीछे कहीं न कहीं उनसे मिली प्रेरणा भी है।

कुछ लोग आपको लिखना सिखाने के लिए सामने बैठाकर कलम नहीं पकड़ाते। आप बस उन्हें पढ़ते, लिखते और किताबों में कुछ खोजते देखते हैं—और धीरे-धीरे शब्दों से आपका अपना रिश्ता बनने लगता है।

शायद प्रेरणा का सबसे सुंदर रूप वही है, जो दी नहीं जाती—अपने आप मिल जाती है।

पाँच दशक में पत्रकारिता कागज से स्क्रीन तक पहुँच गई। माध्यम बदले, पढ़ने की आदतें बदलीं, लेकिन राज जी की एक तस्वीर आज भी वैसी ही है—किताबों से भरा घर और उसमें एक नई किताब के लिए जगह तलाशता हुआ पाठक।

जन्मदिन पर मेरी कामना बस इतनी है—

घर में किताबों के लिए जगह कम पड़ती रहे, लेकिन नई किताबों का आना कभी कम न हो। उनकी कलम पाठकों को यूँ ही अपने साथ यात्राओं पर ले जाती रहे और किसी के काम आने की उनकी यह सहज बेचैनी हमेशा बनी रहे।

जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई राज जी।
स्वस्थ रहें, सक्रिय रहें और लिखते रहें। 🌸🙏

मैं और मेरा हरी मिर्च प्रेम… 💚

एक स्वाद, जिसकी जड़ें बचपन की यादों में हैं

✍️ मोहित धवन
📅 11 सितंबर 2026

परसों सब्ज़ी मंडी जाने लगा तो पत्नी ने चलते-चलते कहा—
“हरी मिर्च मत लाना, घर में रखी हुई है।”

मैंने हाँ कह दिया।

लेकिन मंडी में सब्ज़ियाँ खरीदते-खरीदते जब ताज़ी हरी मिर्च सामने दिखीं, तो उन्हें छोड़कर आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। पता नहीं क्यों, मेरे लिए बिना हरी मिर्च खरीदे सब्ज़ियों की खरीदारी कुछ अधूरी-सी लगती है।

आखिर थोड़ी-सी थैले में आ ही गईं।

शायद यह सिर्फ स्वाद की आदत नहीं है। इसके पीछे बचपन की एक कहानी भी है।

गर्मियों की छुट्टियों में ननिहाल जाना हमारे लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता था। मामा लोगों का खूब लाड़ मिलता और कई बार वे सब्ज़ी खरीदने जाते तो हमें भी साथ ले जाते।

वहाँ हमारी एक खास जिम्मेदारी थी—हरी मिर्च चखकर बताना कि वह तीखी है या नहीं।

मामा दुकानदार से मिर्च लेते और हमारी तरफ बढ़ाकर कहते—
“खा कर बताओ, तीखी है?”

अब बच्चा कच्ची मिर्च क्यों खाए? लेकिन बदले में मिल्क बादाम या कोल्ड ड्रिंक मिलने की उम्मीद हो तो हिम्मत आ ही जाती थी।

मिर्च चखी जाती, मुँह जलता, कभी आँखों में पानी आता और फिर फैसला सुनाया जाता—

“हाँ मामा, ये वाली तीखी है… इसे ले लो!”

अगर मिर्च कम तीखी निकली, तो अगले ठेले पर फिर टेस्ट होता।

शायद हरी मिर्च से मेरी दोस्ती वहीं से शुरू हुई। और मजेदार बात यह कि यह प्रेम सिर्फ हरी मिर्च से रहा; लाल मिर्च मुझे कभी खास पसंद नहीं आई।

अचार में बसा घर और ननिहाल

बचपन के उस स्वाद में माँ के हाथ का हरी मिर्च का अचार और ननिहाल में बनने वाला अचार भी शामिल है।

तब शायद हमने कभी गौर नहीं किया कि ये छोटी-छोटी चीज़ें एक दिन इतनी याद आएँगी। खाने के साथ थोड़ा-सा अचार मिल जाना रोजमर्रा की बात थी। आज समझ आता है कि स्वाद केवल मसालों से नहीं बनता—उसमें जगह, लोग और रिश्ते भी घुले होते हैं।

बाजार से अच्छा अचार आज भी खरीदा जा सकता है, लेकिन माँ के हाथ और ननिहाल वाले स्वाद को खरीदा नहीं जा सकता।

मेरा एक झटपट तरीका

हरी मिर्च खाने का एक आसान तरीका भी समय के साथ मेरा पसंदीदा बन गया।

हरी मिर्च और अदरक को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटिए। उसमें नींबू का रस, थोड़ा नमक, हल्दी और जरा-सी हींग मिला दीजिए।

बस!

न लंबी तैयारी, न कोई मुश्किल विधि। दाल-रोटी या पराठे के साथ रख दीजिए और खाने का जायका बदल जाता है।

शायद यही हरी मिर्च की खासियत है—उसे अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए बहुत कुछ नहीं चाहिए।

रोटी, प्याज और हरी मिर्च

हमारे गाँवों की थाली में इसका एक अलग ही स्थान रहा है।

आज भी गाँव में कई लोग बहुत कुछ उपलब्ध न हो तो रोटी, प्याज और हरी मिर्च के साथ आराम से भोजन कर लेते हैं।

गरम रोटी, साथ में कच्चा प्याज और एक हरी मिर्च—बस।

शहरों में हम खाने के लिए लंबे मेन्यू और तरह-तरह के व्यंजन तलाशते हैं, लेकिन इस साधारण-सी थाली में हमारे पुराने जीवन की एक खूबसूरत बात छिपी है—कम में भी स्वाद और संतोष पा लेना।

और मजेदार बात—मिर्च हमेशा से हमारी थी ही नहीं

जिस मिर्च को आज भारतीय भोजन से अलग करना मुश्किल है, उसका मूल भारत में नहीं माना जाता। मिर्च मध्य और दक्षिण अमेरिका से दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुँची और लगभग पाँच सौ साल पहले पुर्तगाली व्यापारियों के माध्यम से भारत आई।

उससे पहले यहाँ तीखेपन के लिए काली मिर्च और पीपली जैसे मसालों का इस्तेमाल होता था।

लेकिन कुछ ही सदियों में मिर्च हमारे भोजन में इस तरह रच-बस गई कि आज यह खेत से लेकर रसोई तक और चटनी से लेकर अचार तक हर जगह दिखाई देती है।

सोचता हूँ, एक मिर्च की भी कितनी लंबी यात्रा रही होगी—एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक… और फिर मेरी थाली तक।

पर मेरी अपनी कहानी इतिहास की किताबों से नहीं, ननिहाल की उस मंडी से शुरू होती है, जहाँ मिल्क बादाम या कोल्ड ड्रिंक की चाह में एक बच्चा कच्ची मिर्च चखने को तैयार हो जाता था।

अब जब पत्नी कहती हैं—

“हरी मिर्च मत लाना, घर में है…”

तो शायद मैं मिर्च देखकर सिर्फ आज की जरूरत नहीं देखता।

उसमें कहीं मामा के साथ बिताई गर्मियों की छुट्टियाँ हैं, कहीं माँ और ननिहाल के अचार का स्वाद है और कहीं वह बेफिक्र बचपन।

इसीलिए कुछ हरी मिर्च थैले में आ ही जाती हैं।

क्योंकि कई बार हम मंडी से सिर्फ सब्ज़ियाँ नहीं खरीदते…
अपने बीते दिनों की थोड़ी-सी खुशबू भी घर ले आते हैं। 💚

आखिर ऐसा क्या है बाबा नीब करोरी में?

‘हनुमान अंश’ देखते हुए लौटी एक पुरानी स्मृति और मन में उठा एक सवाल

✍️ मोहित धवन
7 सितंबर 2026

आज ‘हनुमान अंश’ देखकर सिनेमा हॉल से बाहर निकला तो मन प्रसन्न था, लेकिन फिल्म मुझे करीब 33–34 साल पीछे भी ले गई।

बात शायद 1992-93 के आसपास की है। हमारे एक शिक्षक हुआ करते थे—रमेश त्रिपाठी जी। उन्होंने बताया कि नीब करोरी मंदिर में हर वर्ष की तरह भंडारा होने वाला है और वहाँ चलने का कार्यक्रम बना।

नीब करोरी वही स्थान है, जिसके नाम से बाबा आगे चलकर दुनिया भर में जाने गए। मेरे लिए इसका एक व्यक्तिगत संयोग यह भी था कि यह मेरे गृह जनपद फर्रुखाबाद में ही है और हमारे यहाँ से लगभग 30 किलोमीटर दूर रहा होगा।

हम भंडारे में शामिल हुए और रात वहीं रुके। तब बाबा के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। इंटरनेट और सोशल मीडिया का समय भी नहीं था। लेकिन मंदिर का वातावरण, श्रद्धालुओं का भाव और वहाँ बिताई वह रात स्मृति में रह गई। इसके बाद वहाँ आना-जाना शुरू हो गया।

नौकरी के सिलसिले में बाद में लखनऊ आया तो हनुमान सेतु मंदिर में नियमित दर्शन होने लगे। कंपनी के काम से नैनीताल-अल्मोड़ा की तरफ जाना होता तो कई बार रास्ते में कैंची धाम भी पहुँचा। इन स्थानों पर एक बात हमेशा महसूस हुई—कुछ देर के लिए मन की भागदौड़ कम हो जाती थी और एक अलग-सी शांति मिलती थी।

समय के साथ बाबा के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ते हुए भी देखा। कभी जिनके बारे में जानकारी मुख्यतः लोगों के अनुभवों और आपसी बातचीत से फैलती थी, आज उनका नाम भारत से बहुत दूर तक पहुँच चुका है।

इसकी एक चर्चित कड़ी Steve Jobs से भी जुड़ती है।

Apple की स्थापना से पहले 1974 में युवा Jobs भारत आए थे। बाबा के बारे में सुनकर वे कैंची धाम पहुँचे, हालांकि बाबा 1973 में शरीर छोड़ चुके थे और दोनों की मुलाकात नहीं हो सकी। एक अमेरिकी युवा की आध्यात्मिक खोज उसे उत्तराखंड के एक आश्रम तक ले आई—अपने आप में यह प्रसंग दिलचस्प है।

करीब आधी सदी बाद बाबा की कहानी एक बिल्कुल अलग माध्यम से बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँची।

करीब दो करोड़ रुपये के सीमित बजट में बनी हनुमान अंश शुरुआती दिनों में बॉक्स ऑफिस पर संघर्ष करती दिखाई दी। फिर word-of-mouth ने गति पकड़ी और फिल्म 150 करोड़ रुपये का आँकड़ा पार कर गई।

इस फिल्म से जुड़ी एक और कहानी ने लोगों का ध्यान खींचा—सुनील लोधी की।

ट्रेन में गाना गाने वाले सुनील की आवाज़ को पहचान मिली और एक गीत ने उनके लिए बॉलीवुड का रास्ता खोल दिया। इसे देखकर यह भी महसूस होता है कि हमारे आसपास कितनी प्रतिभाएँ ऐसी होंगी, जिन्हें अपनी जिंदगी बदलने के लिए शायद केवल एक सही अवसर की जरूरत है।

इन तीनों घटनाओं की अपनी-अपनी तार्किक व्याख्या संभव है।

Steve Jobs की भारत यात्रा को आध्यात्मिक जिज्ञासा के संदर्भ में देखा जा सकता है। छोटी फिल्म की बड़ी सफलता के पीछे दर्शकों का जुड़ाव और मजबूत word-of-mouth हो सकता है। सुनील की कहानी प्रतिभा, अवसर और सही समय के मिलने की कहानी हो सकती है।

इसलिए मैं इनमें किसी चमत्कार को स्थापित करने या उसका प्रचार करने की कोशिश नहीं करना चाहता।

मेरी दिलचस्पी किसी निष्कर्ष से ज्यादा उस प्रश्न में है, जो हनुमान अंश देखते हुए मन में आया।

एक संत, जिन्होंने दशकों पहले शरीर छोड़ दिया—उनके प्रति आकर्षण समय के साथ कम होने के बजाय इतना व्यापक कैसे होता चला गया?

क्या यह उनके व्यक्तित्व की सरलता है?
उनकी शिक्षाएँ हैं?
हनुमान जी के प्रति उनकी भक्ति है?
लोगों के एक-दूसरे तक पहुँचते व्यक्तिगत अनुभव हैं?
या आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच मनुष्य की शांति और किसी गहरे अर्थ की तलाश?

शायद हर व्यक्ति इसका उत्तर अपने अनुभव और दृष्टिकोण से अलग देगा।

मेरे लिए फिल्म ने बस एक पुरानी स्मृति का दरवाजा खोल दिया—1992-93 में अपने शिक्षक के साथ एक वार्षिक भंडारे में शामिल होने के लिए की गई छोटी-सी यात्रा का।

तब यह एक सामान्य यात्रा थी।

आज तीन दशक से अधिक समय बाद दुनिया भर से लोगों को बाबा से जुड़े स्थानों तक पहुँचते देखकर मन में केवल एक जिज्ञासा रह जाती है—

आखिर ऐसा क्या है बाबा नीब करोरी में?

मैं इसका उत्तर पाठक पर छोड़ना चाहूँगा।

आप इसे कैसे देखते हैं—आस्था, संयोग, मानवीय अनुभव या कुछ और?